Friday, November 26, 2010

सोच समझकर बोले

28 सितंबर का दिन था...सुबह से ही पूरे देश अयोध्या फैसले का इंतजार कर रहा था...उस दिन कोमन वैल्थ गेम्स की कुछ खबरे जरूर कम दिख रही थी इसके बारे मे बात मे इस लिए कर रहा हू क्योकि 28 से पहले मीडिया का पूरा फोकस कोमन वैल्थ पर ही था...और दोने ही मामलो मे मीडिया की भूमिका कोई नही नकार सकता...कोमन वैल्थ गेम्स की तैयारियो हर रोज राष्टीय और अन्तराष्टीय न्यूज चैनले की हेडलाइन बन रही थी....मेरे भी कुछ जानने वाले हर रोज फोन करके पूछते की क्या होगा देश की लाज बच पाएगी या नही...तो दूसरी तरफ देश का इतना बडा फैसला कि आम आदमी भी उतना ही उत्सुक जितना हमारे राजनेता या फिर कोई बिजनेस मैन....फैसले की तारीक से पहले देश मे मेहमान आ चुके थे मै खुद उस दिन एयर पोर्ट गया था जब इग्लैंड की पहली टीम हमारे देश मे आए थे...जैसे जैसे 28 तारीक नजदीक आती जा रही थी मीडिया भी गेम्स की खबरो से हटता जा रहा था...दिल्ली से हमारे तेज तरार सवांददाताओ की टीम भेजी जा रही थी...इस तरह की तैयारी थी जैसे की 6 दिसंबर 1992 को जो हम कवर नही कर पाए थे अब की बार नही छोडेगे...सब कुछ EXCLUSIVE चलाएगे....उस दिन मुझे भी विश्व हिन्दू परिषद भेजा गया था 3:30 बजे फैसला आना था मै सुबह ही वहा जाके बैठ गया था...वहा गया तो देखा टेंट लगाकर पूरा इंतजाम किया गया था ऐसा लगा जैसे परवीन तोगडिया अपनी साल पिराह मना रहे है...वहा पहले से ही कुछ और साथी बैठे हुए थे ये वो लोग जो मेरी तरह अयोध्या नही गये थे.... फैसले की कापिया बाहर आनी शुरू हुई तो जैसे लगा कि पता नही क्या होगा...सभी चैनेलस के हेड न्यूज रूम मे खडे थे और फैसले से जूडी हर एक खबर उनसे पूछ के चलाई जा रही था...फैसला किसी के भी हक मे रहा हो इसपे मे कुछ नही कहना चाहता लेकिन शाम होते होते देश मे शंति का माहौल बना रहा...इससे उन लोगो को जवाब जरूर मिल गया जो हमेशा मीडिया को दोषी बताते है...और ऐसा एक बार नही ना जाने कितनी बार आपना काम मीडिया ने जिम्मेदारी से किया है...चाहे वो कामनवेल्थ खेलो की बात हो या फिर आदर्श घोटाले जैसे मामले हो...पामेला धक धक चलाना आर्थिक मजबूरी है लेकिन आलोचना करने वालो को मीडिया समय समय पर जवाब देता रहता है....

Tuesday, September 21, 2010

काश मिर्च्पुर में भी शहीद स्मारक बना होता

१४ सितम्बर सुबह ऑफिस नहीं गया सोचा सीधा फिएल्ड में ही जाउगा...१० बजे घर से निकला और अकबर रोड जा ही रहा था की ऑफिस से फ़ोन आया की आपको हिसार जाना हा मुझे थोडा बहुत पता था जाट आरक्षण की मांग कर रहे हा तो मुझे एक दम से याद आया की बड़ी खबर हा मेने कहा ठीक में २४ अकबर रोड पे हु गाड़ी यहाँ ही भेज दीजिये...में १ बजे के आस पास निकला...मुझे पता था की हिसार से ठीक पहले हंसी में कर्फेव लगा हुआ हे और वहा जाना थोडा मुस्किल; हे...में हर वो तरीका सोच रहा था जिससे में वहा पहुच सकू जहा असली फसाद हे ,,,,महियाद्द वो गाँव जहा जाटो के बड़े नेता सुनील का शव लेके सड़क पे बैठे थे... में शाम ७ बजे हिसार के कफ्ही नजदीक था सामने कुछ लोग दिखे जाम लगा हुआ था हमारी ओबी भी साथ थी ...में थोडा पास गया तो देखा की बीस के लग भग लड़के हाथो में कुल्हाड़ी और डंडे लेके खड़े थे...शराब के नशे में धुत ...उनके पास गया और कहा की भाई मीडिया में काम करतातुम हु डेल्ही से आया हु मुझे जाने दो...तो जवाब मिला मिला तुम वही लोग होना जो हर रोज़ दिखाते हो तालिबानी फरमान और न जाने क्या क्या उन लोगो ने जो मुझसे पहली बात की वो ओव्नेर किल्लिंग्स के बारे की और शिकायत की आप हमारे बारे में बहुत गन्दा दिखाते हो शराब के नशे शायद वो लड़का भूल गया था की मामला आरक्षण का हे....मेने फिर उनको संजना शुरू किया की जब तक मीडिया खबर नहीं दिखाएगी तो तुम्हरी मांग पूरा देश कैसे सुनेगा ...क्यों की मुझे लोकल भाषा आती थी में उन्हें समजा पा रहा था मेरी एक घंटे की कोशिश के बाद उन लोगो ने मुझे जाने दिया लेकिन मेन रास्ते से नहीं गाँव के बिच से वाले रास्ते से ....जैसे ही आगे बड़ा तो असली तांडव दिखना शुरू हुआ

.एक दिन पहले पुलिस और जाटों के झगडे में सुनील की गोली लगने से म़ोत हो गयी थी...जिसके बाद जाट आरक्षण की आग और ज्यादा भड़क गयी...जो लोग आरक्षण की बाग़ डोर सम्भाल रहे थे उनके हाथ से डोर छुट गयी और उसके बाद का हिसार,बरवाला ,उकलाना ,हाँसी जहा भी आस पास नज़र पड़ी बंद दुकाने ,बाज़ार में झुके हुए शटर,जहा भी देखा दूर दूर तक कुछ भी नज़र नहीं आता था और जहा तक मेने उन लोगो को समझा कोई भी आरक्षण का मतलब नहीं जानता था....अब आपको कुछ पुराणी बाते याद दिलाता हु ....
१८ साल की अपाहिज सुमन ने कभी न सोचा था की दलित के घर जन्म लेना इतना बड़ा गुनाह होगा और न ही ६० साल के तारा चाँद ने कभी सोचा था की जिंदगी के आखरी पड़ाव पर वो इतनी जिलत की मौत मरेगा..... अब आप लोग सोच रहे होगे की में किस तारा चाँद और सुमन की बात कर रहा हु दरअसल में उन बदनसीब लोगो का जिक्र कर रहा हु जिन्हें हिसार के मिर्ज्पुर गाँव में कुछ उची जाती के लोगो ने जिन्दा जला दिया और दो दर्जन से ज्यादा घरो में आज लगा दी और इतना सब कुछ तब हुआ जब उन दलितों की सुरक्षा के लिए गाँव में तहसीलदार और पोलिसे फोर्स मौजूद थी ऐसा लग रहा हे की जैसे पुलिस उन लोगो की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि उन दबंग लोगो के लिए थी ताकि वो लोग अपना काम सही ढंग से अंजाम दे सके.....मिर्ज्पुर गाँव हिसार से ६५ किलोमीटर की दुरी पर बसा हे जहा लगभग १५० घर दलित समुदाय के ,२००० जाट समुदाय के और ५०० घरो में बाकि सभी जाती के लोग रहते हे इतने बड़े घटना क्रम के बाद राज्य सरकार अभी भी चुप्पी सादे बैठी हे ऐसे कोम्मुनल मामलो में सरकार पहले भी चुप ही रही हे हा पहले का जिक्र बाद में करेगे .....अगर में आपको इस घटना का कारण बताऊ तो शायद ही आपको विश्वास होगा घटना से ४ दिन पहले एक उची जाती का व्यक्ति दलितों की बस्ती से गुजर रहा था कुत्ता भोका तो उस व्यक्ति के आहम को ढेस पहुची और वो उशे मरने लगा एक दलित ने बस इतना ही कहा की ये तो जानवर हे इसे क्यों मर रहे हो तो बस फिर क्या था बस इतनी सी बात के ऊपर पंचायत हुई तो वहा भी दलितों की पिटाई की गयी उससे भी मन नहीं भरा तो उन बेचारो के घर जलाए गए सुमन और तारा चाँद को कुत्ते के भोकने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.... और सरकार अभ भी तमाशा देख रही हे हरियाणा से दो संसाद दलित हे जिनमे से एक केंद्रीय मंत्री हे तो दुसरे युवाओ का मार्ग दर्शन करते हे संसद सत्र चल रहा हे लेकिन किसी को ज़रूरी नहीं लगा की संसद में सरकार से ये सवाल किया जाये की राजधानी से महज १०० किलोमीटर की दुरी पर कत्ले आम हो रहा हे और यहाँ सब हमाम में नंगे हो रहे हे ......जैसे ही ये खबर सुनी तो एक दम से ३१ अगस्त २००५ का गोहाना कांड जहन में आया जिसमे ६० से ज्यादा दलितों के घर जला दिए गए थे उस घटने के वक्त यही हूडा सरकार थी उस वक्त की लाचारी तो ये थी की गोहाना में ४०००० से ज्यादा जाट हे जिनके आगे सरकार बहुत छोटी हो जाती हे लेकिन इस बार सरकार क्या बहाना बनाएगी ये मुझे समाज नहीं आता बहरहाल गोहाना कांड में उन लोगो को कितना इंसाफ मिला ये तो आप और हम सब जानते हे ....लेगीं सवाल ये उठथा हे की हरियाणा के इन चौधरीओ और खाप पंचायतो के आगे हरियाणा सरकार लगडी क्यों हो जाती हे कही वोट बैंक का खतरा तो नहीं 'शायद'? सुमन और तारा चाँद के लिए सड़क पर बैठ कर शहीद स्मारक की मांग करने वाला कोई नहीं...

Saturday, April 24, 2010

ऐसी क्या मज़बूरी हे हूडा साहब

देश का एक ऐसा समपन्न राज्य जहां जीडीपी के आंकड़े सिर्फ विकास की बात करते हैं.. ..एक ऐसा राज्य जिसके खाते में आते हैं गुड़गांवा जैसे शहर जहां देश का कॉर्परेट कल्चर परवान चढ रहा है...लेकिन बीते बुधवार देश के इसी राज्य में वो देखने को मिला..जिसकी कल्पना शायद किसी भी लोकतंत्र में करना मुश्किल है..और फिर हम तो हमेशा इस बात पर गर्व करते हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के बाशिंदें हैं...जी हां इस बार भी लडाई वहीं पुरानी है..और लड़ने वाले लोग भी...एक तरफ है समाज का वो तपका जिसे देश के संविधान ने बराबारी का हक़ दिया है...तो दूसरी तरफ है देश की आबादी का वो मुट्ठी भर हिस्सा जिसके चौधरी आज भी अपने आप को देश की सर्वोच्च अदालत से उंचा मानते हैं...इन चौधरिय़ों के फरमान को तो शायद भगवान भी चुनौती न दे सकें...बहरहाल फिलहाल इस समाज की अहंकारवादी सोच का शिकार बनें १८ साल की अपाहिज सुमन और उसका दलित पिता...सुमन ने शायद कभी न सोचा होगा की दलित के घर जन्म लेना इतना बड़ा गुनाह होगा और न ही ६० साल के तारा चाँद ने कभी सोचा था की जिंदगी के आखरी पड़ाव पर वो इतनी जिलत की मौत मरेगा..... अब आप लोग सोच रहे होगे की मैं किस तारा चाँद और सुमन की बात कर रहा हु दरअसल में उन बदनसीब लोगो का जिक्र कर रहा हु जिन्हें हिसार के मिर्ज्पुर गाँव में कुछ उची जाती के लोगो ने जिन्दा जला दिया और दो दर्जन से ज्यादा घरो में आज लगा दी और इतना सब कुछ तब हुआ जब उन दलितों की सुरक्षा के लिए गाँव में तहसीलदार और पोलिसे फोर्स मौजूद थी ऐसा लग रहा हे की जैसे पुलिस उन लोगो की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि उन दबंग लोगो के लिए थी ताकि वो लोग अपना काम सही ढंग से अंजाम दे सके.....मिर्ज्पुर गाँव हिसार से ६५ किलोमीटर की दुरी पर बसा हे जहा लगभग १५० घर दलित समुदाय के ,२००० जाट समुदाय के और ५०० घरो में बाकि सभी जाती के लोग रहते हे इतने बड़े घटना क्रम के बाद राज्य सरकार अभी भी चुप्पी सादे बैठी हे ऐसे कोम्मुनल मामलो में सरकार पहले भी चुप ही रही हे हा पहले का जिक्र बाद में करेगे .....अगर में आपको इस घटना का कारण बताऊ तो शायद ही आपको विश्वास होगा घटना से ४ दिन पहले एक उची जाती का व्यक्ति दलितों की बस्ती से गुजर रहा था कुत्ता भोका तो उस व्यक्ति के आहम को ढेस पहुची और वो उशे मरने लगा एक दलित ने बस इतना ही कहा की ये तो जानवर हे इसे क्यों मर रहे हो तो बस फिर क्या था बस इतनी सी बात के ऊपर पंचायत हुई तो वहा भी दलितों की पिटाई की गयी उससे भी मन नहीं भरा तो उन बेचारो के घर जलाए गए सुमन और तारा चाँद को कुत्ते के भोकने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.... और सरकार अभ भी तमाशा देख रही हे हरियाणा से दो संसाद दलित हे जिनमे से एक केंद्रीय मंत्री हे तो दुसरे युवाओ का मार्ग दर्शन करते हे...दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र जिसे कभी-कभी दुनिया लोकतंत्र का मंदिर भी कहती है...उस मंदिर में भी किसी ने इन अछूत दलितों की आवाज़ उठाने के बारे में नहीं सोचा...आईपीएल की गूंज के बीच दलितों के ये आवाज़े कुछ दब सी गईं..हैं...बहरहाल दलितों पर हो रहे हमले ये सोचने पर कम से कम मुझे तो जरुर मजबूर कर रहे हैं कि क्या हम वाकई एक लोकतंत्र में रह रहे हैं? सवाल तो यबस फर्क इतना है कि संसद सत्र चल रहा हे लेकिन किसी को ज़रूरी नहीं लगा की संसद में सरकार से ये सवाल किया जाये की राजधानी से महज १०० किलोमीटर की दुरी पर कत्ले आम हो रहा हे और यहाँ सब हमाम में नंगे हो रहे हे ......जैसे ही ये खबर सुनी तो एक दम से ३१ अगस्त २००५ का गोहाना कांड जहन में आया जिसमे ६० से ज्यादा दलितों के घर जला दिए गए थे उस घटने के वक्त यही हूडा सरकार थी उस वक्त की लाचारी तो ये थी की गोहाना में ४०००० से ज्यादा जाट हे जिनके आगे सरकार बहुत छोटी हो जाती हे लेकिन इस बार सरकार क्या बहाना बनाएगी ये मुझे समाज नहीं आता बहरहाल गोहाना कांड में उन लोगो को कितना इंसाफ मिला ये तो आप और हम सब जानते हे ....लेगीं सवाल ये उठथा हे की हरियाणा के इन चौधरीओ और खाप पंचायतो के आगे हरियाणा सरकार लगडी क्यों हो जाती हे कही वोट बैंक का खतरा तो नहीं 'शायद'?