Saturday, April 24, 2010

ऐसी क्या मज़बूरी हे हूडा साहब

देश का एक ऐसा समपन्न राज्य जहां जीडीपी के आंकड़े सिर्फ विकास की बात करते हैं.. ..एक ऐसा राज्य जिसके खाते में आते हैं गुड़गांवा जैसे शहर जहां देश का कॉर्परेट कल्चर परवान चढ रहा है...लेकिन बीते बुधवार देश के इसी राज्य में वो देखने को मिला..जिसकी कल्पना शायद किसी भी लोकतंत्र में करना मुश्किल है..और फिर हम तो हमेशा इस बात पर गर्व करते हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के बाशिंदें हैं...जी हां इस बार भी लडाई वहीं पुरानी है..और लड़ने वाले लोग भी...एक तरफ है समाज का वो तपका जिसे देश के संविधान ने बराबारी का हक़ दिया है...तो दूसरी तरफ है देश की आबादी का वो मुट्ठी भर हिस्सा जिसके चौधरी आज भी अपने आप को देश की सर्वोच्च अदालत से उंचा मानते हैं...इन चौधरिय़ों के फरमान को तो शायद भगवान भी चुनौती न दे सकें...बहरहाल फिलहाल इस समाज की अहंकारवादी सोच का शिकार बनें १८ साल की अपाहिज सुमन और उसका दलित पिता...सुमन ने शायद कभी न सोचा होगा की दलित के घर जन्म लेना इतना बड़ा गुनाह होगा और न ही ६० साल के तारा चाँद ने कभी सोचा था की जिंदगी के आखरी पड़ाव पर वो इतनी जिलत की मौत मरेगा..... अब आप लोग सोच रहे होगे की मैं किस तारा चाँद और सुमन की बात कर रहा हु दरअसल में उन बदनसीब लोगो का जिक्र कर रहा हु जिन्हें हिसार के मिर्ज्पुर गाँव में कुछ उची जाती के लोगो ने जिन्दा जला दिया और दो दर्जन से ज्यादा घरो में आज लगा दी और इतना सब कुछ तब हुआ जब उन दलितों की सुरक्षा के लिए गाँव में तहसीलदार और पोलिसे फोर्स मौजूद थी ऐसा लग रहा हे की जैसे पुलिस उन लोगो की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि उन दबंग लोगो के लिए थी ताकि वो लोग अपना काम सही ढंग से अंजाम दे सके.....मिर्ज्पुर गाँव हिसार से ६५ किलोमीटर की दुरी पर बसा हे जहा लगभग १५० घर दलित समुदाय के ,२००० जाट समुदाय के और ५०० घरो में बाकि सभी जाती के लोग रहते हे इतने बड़े घटना क्रम के बाद राज्य सरकार अभी भी चुप्पी सादे बैठी हे ऐसे कोम्मुनल मामलो में सरकार पहले भी चुप ही रही हे हा पहले का जिक्र बाद में करेगे .....अगर में आपको इस घटना का कारण बताऊ तो शायद ही आपको विश्वास होगा घटना से ४ दिन पहले एक उची जाती का व्यक्ति दलितों की बस्ती से गुजर रहा था कुत्ता भोका तो उस व्यक्ति के आहम को ढेस पहुची और वो उशे मरने लगा एक दलित ने बस इतना ही कहा की ये तो जानवर हे इसे क्यों मर रहे हो तो बस फिर क्या था बस इतनी सी बात के ऊपर पंचायत हुई तो वहा भी दलितों की पिटाई की गयी उससे भी मन नहीं भरा तो उन बेचारो के घर जलाए गए सुमन और तारा चाँद को कुत्ते के भोकने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.... और सरकार अभ भी तमाशा देख रही हे हरियाणा से दो संसाद दलित हे जिनमे से एक केंद्रीय मंत्री हे तो दुसरे युवाओ का मार्ग दर्शन करते हे...दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र जिसे कभी-कभी दुनिया लोकतंत्र का मंदिर भी कहती है...उस मंदिर में भी किसी ने इन अछूत दलितों की आवाज़ उठाने के बारे में नहीं सोचा...आईपीएल की गूंज के बीच दलितों के ये आवाज़े कुछ दब सी गईं..हैं...बहरहाल दलितों पर हो रहे हमले ये सोचने पर कम से कम मुझे तो जरुर मजबूर कर रहे हैं कि क्या हम वाकई एक लोकतंत्र में रह रहे हैं? सवाल तो यबस फर्क इतना है कि संसद सत्र चल रहा हे लेकिन किसी को ज़रूरी नहीं लगा की संसद में सरकार से ये सवाल किया जाये की राजधानी से महज १०० किलोमीटर की दुरी पर कत्ले आम हो रहा हे और यहाँ सब हमाम में नंगे हो रहे हे ......जैसे ही ये खबर सुनी तो एक दम से ३१ अगस्त २००५ का गोहाना कांड जहन में आया जिसमे ६० से ज्यादा दलितों के घर जला दिए गए थे उस घटने के वक्त यही हूडा सरकार थी उस वक्त की लाचारी तो ये थी की गोहाना में ४०००० से ज्यादा जाट हे जिनके आगे सरकार बहुत छोटी हो जाती हे लेकिन इस बार सरकार क्या बहाना बनाएगी ये मुझे समाज नहीं आता बहरहाल गोहाना कांड में उन लोगो को कितना इंसाफ मिला ये तो आप और हम सब जानते हे ....लेगीं सवाल ये उठथा हे की हरियाणा के इन चौधरीओ और खाप पंचायतो के आगे हरियाणा सरकार लगडी क्यों हो जाती हे कही वोट बैंक का खतरा तो नहीं 'शायद'?